STORYMIRROR

Raghav Dixit

Classics Crime Inspirational

4  

Raghav Dixit

Classics Crime Inspirational

लड़की

लड़की

1 min
23

राह थी राहगीर थे 

तमाशा चल रहा था 

सब तमाशा देखते 

एक मनचला था 

 साथ में उसके महबूब थी 

यहां तक तो ठीक था 

पर दुष्ट उसको खींचता 


एक थप्पड़ जो पड़ा 

गाल उसका झन्ना गया 

होश जब तक संभालती 

कुछ कहती कुछ पूछती 

नाक पर मुक्का जा जमा 

बस होश खोकर गिर पडी 


मनचला यहीं ना रुका 

उसके सिर पर

 लात पे लात ज़माने लगा 

हांथ में हथियार था 

अंत को उसके तैयार था 


प्रदर्शनी का दौर था 

मजमा चहूँ ओर था 

कोई उस लम्हें को 

फोन में कैद करने में व्यस्त था 

कोई मौन हो तमाशा 

देखने में मस्त था 


मौन हो बस तमाशा देखिये 

ना कुछ कहिये, 

ना कुछ कीजिए 

कहने को तो भीड़ थी 

क्योंकी जो मरी 

वो आपकी कौन थी?


सड़क पर लहू-लुहान थी पडी 

साँस उसमें कहाँ बची 

मनचले को कहाँ संतोष था 

पत्थर उठाकर, दे मारा 

सिर में उसके जोर सा 


कल को जब चर्चा चलेगी 

ये घटना कैसे घटी ?

पैनलो में बैठकर 

ये ही जाहिल ज्ञान देंगे 

नारी सशक्तिकरण को 

ये शब्द का अम्बार देंगे 


सरकार को कोसेंगे 

प्रशासन पर अंगुलियां उठाएंगे 

भीड़ में घुस तमाशा देखने वाले 

नपुंसक अपनी बुजदिली को 

शब्दों का जामा पहनाएंगे 


आज बेटी किसी और की थी 

कल किसी और की होगी 

परसों क्या करोगे ?

जब सड़क पर ,

बेटी आपकी होगी 


पर एक बात याद रखना 

इसे घटना कहके मत टालना 

ये उस प्रथा की शुरुआत है 

आपकी बेटी तक

 पहुँचने वाली जिसकी आंच है।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Classics