मज़हबी इंसानियत
मज़हबी इंसानियत
ऊपर वाले ने तो महज़ इंसान बनाये,
हमने बना दिए कईं और दायरे।
ख़ुद का ख़ुद ही से भेद करे,
आख़िर कैसे हैं ये कायदे ?
नाम की पहचान तक तो ठीक था,
हमने तो रंगों पर भी हक़ अपना जताया।
कब किसी मुल्क में, इंद्रधनुष ने
रंग अपना बस एक दिखाया ?
मौका परस्त बन गए हैं हम,
किसी के दर्द में अब, आँसु नहीं बहाते।
बल्कि, एक दूसरे पर इलज़ाम लगाने का,
मौका उसे समझ कर, हम हैं मुस्कराते।
अब तो पड़ता भी नहीं हमको फर्क देख,
ख़ून, आँसु और उजड़े जलते घर।
अपने अहम् को ताव देते हैं,
देख दूसरे की आँखों में अपना डर।
हर एक बचपन को, मज़हबी रंगों से रंगने में,
इतने मशरूफ हो जाते हैं,
दूसरे की ख़ामियों से तो करा देते हैं वाकिफ़,
पर इंसान बनाना भूल जाते हैं।
