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Kahkashan Danish

Tragedy

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Kahkashan Danish

Tragedy

मजबूरी

मजबूरी

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कैसा मौसम आया है,

बड़ी तबाही लाया है।


लोग जुदा हैं अपनों से भी,

ख़तरा सब पर छाया है।


खाने की मजबूरी में कुछ,

घर जाने की चिंता में,


बेचारा मज़दूर हमारा,

दूरी रख ना पाया है।


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