मिट्ठूराम
मिट्ठूराम
सड़क किनारे रोज बैठता
लेकर पंडित मिट्ठूराम,
रटता वह तोता हरदम
बस राम-राम राम-राम,
पंडित यह आवाज लगाता
बड़े हैं अद्भुत इसके काम,
हो चाहे कैसी भी समस्या
आकर यहाँ पाओ आराम,
ये निकाले वो ही परची
जो जिसके होती है नाम,
बताता यह तोता भविष्य
होते यहाँ उचित हैं दाम,
पहले आओ पहले पाओ,है
इक उत्तर का मुफ्त ईनाम,
आओ आओ आजमाओ
गुण गाओगे मेरे आठों याम,
एक दिन की बात है भईया
ढ़ला दिन जब आई शाम,
थक हारकर पंडित जी,जब
थे भर नींद कर रहे आराम,
आया पिंजरे से बाहर तोता
मौके को देकर के अंजाम,
लगा ताकने इधर-उधर,जोर
से धडकते दिल को थाम,
धीमी आवाज में लगा रटने
हराम-हराम-हराम-हराम,
बचालो मुझे पोंगे पंडित से
किया इसने जीना हराम,
जा रहा था वहाँ से बच्चा
अपनी दादी की ऊँगली थाम,
कर बैठा वह जिद दादी से
ले चलो तोते को अपने *धाम,
तोते के बल पर पलने वाला
करता ही रह गया विश्राम,
खुद उसी के भविष्य पर
लग चुका था आज विराम,
तोता चल दिया दादी संग
राम धुन का मान परिणाम,
चल पड़ा वह खुशी-खुशी
रटता हुआ फिर राम-राम।
धाम-का अर्थ यहाँ "घर" से है।
