तन्हाईयाँ भी अच्छी हैं
तन्हाईयाँ भी अच्छी हैं
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होती है मुलाकात मेरी जब भी तन्हाई से
करती हूँ बातें ढेरों मैं अपनी ही परछाई से,
लगाती हूँ गोते अपने दिल के समंदर में
निकलकर बाहर इस दुनिया कि गहराई से,
पलटती हूँ कुछ पन्ने मैं अपने किरदार के
मिलाते हैं वो मुझे मेरी अच्छाई-बुराई से,
कभी देखती हूँ जमीन तो कभी आसमान
सीखती हूँ बहुत इनकी निचाई से-ऊँचाई से,
कभी-कभी होती है तन्हाईयाँ भी अच्छी,ये
मिटा देती हैं दूरी हमारी खुद की जुदाई से।
