महाशत्रु अपना प्रदूषण
महाशत्रु अपना प्रदूषण
महाशत्रु अपना प्रदूषण, इसको दूर हटाना है।
प्रदूषण मुक्त क्षितिज पर अपना, जीवन सफल बनाना है।
क्षिति जल पावक नभ समीर ये, महाभूत कहलाते हैं।
पाँचों मिलकर इस दुनिया में, जीव अनेक बनाते हैं।।
जीवन की रक्षा के खातिर, इनको निर्मल रखना है।
सुंदर निज प्यारी धरती को, सदा सदा ही लखना है।
निर्मल जल के अंतर में भी, सुंदर दुनिया बसती है।
बनी रहे यह दुनिया प्यारी, जिसे निरख भू हँसती है।।
अमल नीर से ही धरणी पर, जीवन सबका चलता है।
वारि प्रदूषित हो जाने से, जीवन जीवन छलता है।
शुद्ध वायु भी मिले सभी को, ऐसा हमको करना है।
वृक्षों की रक्षा कर भू को, हरा भरा नित रखना है।।
धरती माता अपने तल पर, जीव जगत को धरती है।
रस देकर अपने ही तन का, सब का पालन करती है।
पोषण सब को शुद्ध मिले नित, माटी निर्मल रखनी है।
गरल मृदा में हम न मिलाएं, मिट्टी पोषक रखनी है।।
शब्द सदा ही शिवकारी हों, मंगल-नाद सुनाना है।
मस्ती के मद में मानव को, कभी न शोर बढ़ाना है।
आपस के रिश्ते भी सुंदर, मिलकर हमें बनाने हैं।
रिश्तो से ही सजता जीवन, रिश्ते हमें सजाने हैं।।
