महापुरुष
महापुरुष
महापुरुष अपनी उपलब्धियों
को श्रेष्ठतम कदापि नहीं कहते !
नहीं वे अपनी नीतियों का सदा
लोगों के सामने बखान करते !
श्रेष्ठतम वह व्यक्ति होता है जहां में
जो सभी की उपलब्धियों का सम्मान करते !
शिवगंग धारा से जगत का प्यास बुझता
नील कंठ बनकर सदा विष पान करते !
सबके जीवन में नया कुछ और आता
आप उसके पास आकर उर लगाते !
यह भावना कैसे विलुप्त हो गयी
काश ! उसका दुःख दर्द आप बाँट लेते !
