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मेरी प्रेम कवितायेँ

मेरी प्रेम कवितायेँ

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अच्छा ये बताओ तुम 

कि तुम्हें अब भी मेरी 

प्रेम कविताओं में तुम 

नज़र नहीं आती क्या। 


अच्छा ये बताओ तुम 

क्या तुम्हें अब भी मेरे 

उन अनलिखे लिखे  

खाली पन्नों में मेरे,


दिल की सदा सुनाई 

नहीं देती क्या 

जिसमे मैंने खुद को 

तुम्हारे हाथों हार कर,


स्वीकारा था की “हाँ  

मुझे मुहब्बत है एक 

सिर्फ तुमसे बोलो क्या 

इसलिए तुम अब तक 

नहीं लांघ पायी हो उस,

  

घर की दीवारी को बस 

इतना ही बता दो तुम ! 


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