मेरी मां
मेरी मां
वह मेरी मां थी।
वह मेरे हर दर्द का निदान थी।
वह मेरी हर समस्या का समाधान थी।
उसके आंचल में छुप जाता था हर दर्द मेरा,
जब तक वह थी मैं किसी भी दर्द से अनजान थी।
मेरी हर बात ध्यान से वह सुनती थी।
मेरे ही लिए जाने कितने स्वप्न वह बुनती थी।
वह मां थी मेरी खामोशी को भी पढ़ लेती थी।
जब मैं बोलना भी नहीं जानती थी वह तब भी मेरी सुन लेती थी।
दुआओं का घर में उसने अंबार लगा रखा था।
खुशियों से उसने पूरा घर ही सजा रखा था।
उसके जाने के बाद घर जो वीराना हुआ।
घर के सब लोगों का अलग अलग ही अपना-अपना फसाना हुआ।
मां मोतियों सा बांधा हुआ था तूने जिस कर को,
वह घर अब घर ना रहकर एक पागल खाना हुआ।
मैं सोचती हूं तू इतना सब कैसे सहती थी।
कभी भी किसी को भी तो तू कुछ ना कहती थी।
प्यार की साक्षात मूर्ति थी तू,
पूरे घर को जोड़ने वाली एक कड़ी थी तू।
