मेरी ख्वाहिश...।
मेरी ख्वाहिश...।
रुकना न कभी मेरी मंजिल था न मेरा मकसद,
मेरी चाह तो हमेशा वो खुला आसमां है,
जहां मेरी कोई पहचान हो,
मेरी कहीं बातों का महत्व हो,
बेशक दुनिया की नजरों में अनजान रहूं,
पर अपनों की नजर में मेरी एक पहचान हो,
लोगों का क्या है मतलब के लिए याद करते हैं,
और मतलब सिद्ध होते भूल जाते हैं,
मुझे ऐसे लोगों की नजरों में नहीं आना,
मुझे तो उस खुदा की नजरों में आना है,
जो बिना स्वार्थ के सबको अपनी शरण में लेता है,
न कभी उन्हें भूलता है न उन्हें हारने देता है,
पहचान मेरी काम से हो बस यही तमन्ना है,
पैसा तो हर जगह बोलता है,
पर व्यवहार लोगों के दिल में जगह बनाता है,
मैं भी अपनी वो पहचान बना पाऊं दिल की तमन्ना है।
