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सागर जी

Abstract

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सागर जी

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मेरी चाह

मेरी चाह

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कितनी मुश्किल है,

कुछ मिलने के बाद भी।

कितनी मंज़िलें हैं,

कुछ पा लेने के बाद भी।


सबकुछ मिल जाए

ये आशा भी नही।

कुछ-कुछ से, दिल बहल

जाए, ये अभिलाषा भी नही।


बस इतनी सी दुआ

है मेरी, ईश्वर से।

मेरा सम्मान बचा रहे,

कुछ मिले भी, या नही।


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