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Jiwan Sameer

Abstract Classics Inspirational

4  

Jiwan Sameer

Abstract Classics Inspirational

मेरे ख्वाबों में

मेरे ख्वाबों में

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रात भर
ख़्वाबों का आना-जाना
लगा रहेगा।

तुम आओगे—
कभी हँसते हुए,
कभी ऐसे
जैसे किसी पुराने सवाल का
जवाब खोज रहे हो
मेरी आँखों में।

कभी इतने पास
कि तुम्हारी साँस
मेरी नींद के किनारे
हल्की-सी गर्मी छोड़ जाएगी,

और कभी
इतने दूर
कि तुम्हारी तरफ़ बढ़ाया हुआ हाथ
सिर्फ़ हवा को छुएगा।

नींद
आँखों में होगी,
लेकिन सुकून—

वह कहाँ होगा?

आँखें बंद करते ही
तुम सामने आ जाते हो।

अजीब है न—

जिसे दिन भर
देख नहीं पाती,
रात उसे
बार-बार मेरे पास भेज देती है।

हर ख़्वाब में
तुम्हारा चेहरा
किसी न किसी बहाने
चला आता है।

कभी
किसी सड़क के मोड़ पर,

कभी
भीड़ में अचानक
मेरी तरफ़ देखते हुए,

कभी
बिना कुछ कहे
सिर्फ़ मुस्कुराते हुए।

और तुम्हारी वह हँसी—

वह नींद में भी
मेरा पीछा करती है।

मैं सोना चाहती हूँ,
लेकिन मेरी यादें
मुझसे पहले जाग जाती हैं।

फिर धीरे-धीरे
सुबह कमरे में उतरती है।

पर्दे की दरार से
आई रोशनी
मेरे सारे ख़्वाबों को
एक-एक करके
बाहर कर देती है।

तकिए पर
बस एक हल्की-सी गर्माहट बचती है
और मन में
तुम्हारा नाम।

आँख खुलती है—

कमरा वही,
सुबह वही,
फोन की स्क्रीन वही।

बस तुम नहीं।

तुम्हारी आवाज़ नहीं।

तुम्हारा
“कैसी हो?”
नहीं।

और फिर
दिन अपने हिसाब से
मुझे अपने साथ घसीट ले जाता है।

मैं चाय बनाती हूँ
और पहली चुस्की में
तुम्हें खोजती हूँ।

सड़क पर
कोई पीछे से पुकारता है
तो एक पल को
लगता है—

शायद तुम।

भीड़ में
कोई वैसा ही कंधा दिखता है,
वैसी ही चाल—

दिल
बेवक़्त एक कदम आगे बढ़ जाता है।

फिर पता चलता है—
तुम नहीं हो।

किसी दुकान से
कोई पुराना गाना बजता है
और अचानक
पूरा दिन
तुम्हारी तरफ़ मुड़ जाता है।

शायद याद
ऐसे ही काम करती है—

वह हमारे भीतर
छोटी-छोटी चीज़ों में
किसी का पता छोड़ जाती है।

एक गंध में,
एक आवाज़ में,
एक रास्ते में,
एक खाली कुर्सी में।

रात में
कम-से-कम
तुम मेरे होते हो।

ख़्वाबों की इस छोटी-सी दुनिया में
न दूरी का कोई नियम है,
न समय की कोई दीवार।

मैं तुम्हें देख सकती हूँ,
तुमसे बातें कर सकती हूँ,
तुम्हारे पास बैठ सकती हूँ—

बिना यह सोचे
कि सुबह
क्या होगा।

लेकिन सुबह
हर बार आती है।

और उसके साथ
एक डर भी—

कि तुम फिर चले जाओगे।

फिर वही दिन होगा,
वही काम,
वही भीड़,
वही अकेलापन।

और मैं
शाम ढलने का इंतज़ार करूँगी।

इस उम्मीद में नहीं
कि तुम सचमुच आओगे,

बस इसलिए
कि रात होगी,

मैं आँखें बंद करूँगी,

और शायद
तुम फिर से
मेरे ख़्वाब में
चले आओगे।

कितना अजीब है—

दिन मुझे
तुम्हारी गैरमौजूदगी सिखाता है,

और रात
हर बार
तुम्हें फिर से
मेरा बना देती है।

इसीलिए
मुझे सुबह से शिकायत नहीं,

बस एक छोटी-सी इच्छा है—

आज रात
जब तुम आओ,

तो थोड़ी देर और रुकना।

सुबह होने से पहले
मुझे जगा मत देना।

क्योंकि
हक़ीक़त में तुम नहीं हो,

कम-से-कम
मेरे ख़्वाबों में
मुझे तुम्हारे साथ
थोड़ी देर
जी लेने दो।


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