चीड़ के वन से
चीड़ के वन से
चीड़ के वन से
अचानक कुछ टूटा—
हवा थी शायद।
बर्फ़ की महीन किरचों जैसी
एक सरसराहट
शाखाओं से उतरती हुई
मेरे चेहरे को छू गई
और ढलान के उस पार
गुम हो गई।
मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
लेकिन बहुत देर तक
मेरे कानों में
वही अधूरी आवाज़
ठहरी रही।
अल्मोड़ा की घाटी
उस शाम कुछ और गहरी थी।
सीढ़ीनुमा खेतों पर
धूप का आख़िरी टुकड़ा
धीरे-धीरे बुझ रहा था,
और चीड़ की लंबी छायाएँ
ढलानों पर
किसी पुराने पत्र की
मिटती हुई पंक्तियों-सी
फैल रही थीं।
तभी भीतर
वर्षों से बंद एक दरवाज़ा
बिना आवाज़ के खुल गया।
न कोई स्मृति बाहर आई,
न कोई चेहरा।
सिर्फ़
एक खाली जगह
अचानक भर गई।
मैंने अपनी हथेली
ठंडी हवा में खोल दी।
कुछ भी नहीं था वहाँ।
फिर भी
हथेली देर तक
गर्म रही।
शायद कुछ स्पर्श
शरीर तक पहुँचते ही नहीं।
वे सीधे
उस जगह उतरते हैं
जहाँ आदमी
अपने सबसे कठोर दिनों में भी
किसी को बचाकर रखता है।
नीचे घाटी में
शाम उतर चुकी थी।
चीड़ अब भी हिल रहे थे।
मैं वहीं खड़ा रहा—
न अतीत को पुकारते हुए,
न भविष्य की ओर देखते हुए।
बस उस हवा को सुनता रहा
जो अभी-अभी गुज़री थी।
और पहली बार लगा—
किसी का होना
हमेशा सामने होना नहीं होता।
कभी-कभी
वह चला जाता है,
और उसके बाद
हवा में
एक जगह खाली छोड़ जाता है।
