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मेरे कदम

मेरे कदम

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निराशाओं की तरफ बढ़ते-बढ़ते,

अचानक ही मेरे कदम रुक जाते हैं।

एक सोच फिर से जीने को प्रेरित करती है,


कि गर मौत समान दुख न मिलता जीवन में,

तो मैं सुख-दुख का अन्तर कैसे समझ पाती ?

कैसे समझ पाती जीवन को ?


कैसे समझ पाती औरों के दुख को ?

गर सुख ही सुख मिलता मुझे हर पल तो,

कैसे मैं आशाओं के दीप को

जलाना सीख पाती ?


उस वक्त फिर से मेरे कदम रुक जाते हैं

जब दिल पर घाव टीस देते हैं

एहसास होता है ये सच कि

लोग रिश्तों में प्यार की भीख देते हैं !


है सच ये भी कि मैं कभी-कभी बहुत टूट जाती हूँ

अतीत को याद कर

ईश्वर से अक्सर रूठ जाती हूँ।


जब-जब याद आता है वो दुखों का समंदर

तब-तब निराशाएँ घेरने लग जाती है मुझे,

और मेरे कदम रुक जाते हैं !


फिर से इस सोच के साथ कि गर,

न मिलती मुझे नफरत बेहद अपनों से तो

मैं प्रेम को कैसे समझ पाती ?


कैसे मैं गैरों में छिपे अपनों को और

अपनों में छिपे गैरों को ढ़ूंढ पाती ?

मेरे कदम हमेशा उस वक्त रूक जाते हैं !


जब अहम मुझे घेरने लगता है,

मैं तब याद कर लेती हूँ फिर से अतीत को !

फिर से समेट लेती हूँ उस दुख के समंदर को

अपने भीतर !


जिसने मुझे अपनों के बीच रह तन्हा कर,

मुझे मुझसे मिलाया

मुझे जीना सिखाया

मुझे सुख और दुख के अन्तर को समझाया !


जब-जब निराशाओं से घिरने लगती हूँ मैं,

रोक लेती हूँ अपने कदमों को !

क्योंकि मैंने अब निराशा में आशा को ढ़ूंढना

सीख लिया है !


मैंने आंसुओं को पोंछ हँसना सीख लिया है,

मैंने जीवन को समझ

जीवन को हर हाल में जीना सीख लिया है।


मैंने सीख लिया है जीना

तभी अब सकारात्मकता की राह पर चल,

नहीं रोकती अपने बढ़ते कदमों को

क्योंकि अब मैंने चलना सीख लिया है !

मैंने हँसना सीख लिया है !


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