STORYMIRROR

Drashti Bhanushali

Tragedy

3  

Drashti Bhanushali

Tragedy

मेरा रफ़ीक

मेरा रफ़ीक

1 min
333

हयात की एक ह़कीकत सुनो,

मसरूफ़ है सब अपनी जिंदगी में।

हसीन लम्हों में सब होंगे साथ,

अलविदा कहेंगे वक्त-ए-गर्दिशों में।।


गर्दिश वक्त में एहसास हुआ,

कोई भी मेरे साथ न था।

तब कल्ब ने दिया दिलासा कि,

मेरा रफ़ीक, मेरा आशना,

मेरा हमदम मेरे साथ था।।


साथ था केवल उस दोस्त का,

जो अश्क थे मेरे पोंछता।

मेरी खुशियों में थी उसकी खुशियाँ समाई, तो

बढ़ा दिया था कंधा अपने सिर को टेक लगाने को।।


ऐ दोस्त! एक इल्तिजा है तुझसे,

फ़रियाद न करना यदि भूल हुई हो मुझसे।

मर के भी हमारी दोस्ती अमर हो,

यही दुआ मैं माँगू परवरदिगार से।।


खुदा से यही गुजा़रिश है,

करें इनायत दोस्त पर मेरे।

तबस्सुम रहे उसकी सूरत पर सदा,

मैं जिंदा रहूँ या कब्र में।।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

More hindi poem from Drashti Bhanushali

Similar hindi poem from Tragedy