मेरा पंचनामा
मेरा पंचनामा
आज फिर वो मुझसे पूछेंगे,
चमड़ी उधेड़ कर खींचेगे ।
कहां कैसे किन हालातों में,
क्यों कब कैसे मरा पूछेंगे।।
भेजा मज़्ज़ा को बुलाकर,
अंतड़ियों को भी सुलाकर।
दिलो दिमाग को बारी बारी,
उलट पलट हर झांकेंगे।
आज फिर वो मुझसे पूछेंगे।।
जानते हैं वो मैं बोलूंगा क्या,
किन हालातों मे मैने किया क्या।
फिर भी अपनी किताबी ज्ञान,
जाहाँ फांक दिखे वहां ठूँसेंगे।
आज फिर वो मुझसे पूछेंगे।।
खामोश रहना मुमकिन है क्या!
चोट कचोट बार बार हो अगर!
मगर उबलो अब्बलों के सामने,
अपनी सान की तौहीन सोचेंगे।
आज फिर वो मुझसे पूछेंगे।।
दीया की बाती सोचती भी अगर,
घी में डूब कर बच निकलने की।
टिका कर काड़ी कोचक कोचक कर,
उस बाती को जलाये रखेंगे।
मौत के कगार तक खींचेंगे......
आज फिर वो मुझसे पूछेंगे।
