मदहोंश सरगम
मदहोंश सरगम
मेरे इश्क की गज़ल की स्याही है तू,
मेरे कलम को शब्दों से सजाती है तू,
जब मै तेरी गज़ल लिखता हूँ सनम,
हर शब्द में मुझको नज़र आती है तू।
मेरी इश्क की गज़ल का मक्ता है तू,
मेरी गज़ल का खूबसूरत मत्ला है तू,
जब भी मै गज़ल लिखता हूंँ सनम,
गज़ल की मिसरा की मुस्कान है तू।
मेरी गज़ल का श्रृंगारिक रदीफ़ है तू,
मेरी गज़ल का जीवंत काफ़िया है तू,
"मुरली" जब स्वरबद्ध करता हूंँ सनम,
मेरी गज़ल की मदहोंश सरगम है तू।
रचना:-धनज़ीभाई गढीया"मुरली" (ज़ुनागढ - गुजरात)

