मौत से आंँखें मिलाना चाहता हूं
मौत से आंँखें मिलाना चाहता हूं
मौत से आंँखें मिलाना चाहता हूं।
डर ज़माने का मिटाना चाहता हूं।
रोज़ ही मर्दानगी के काम करके ,
मर्द हूंँ सब को बताना चाहता हूं।
काम दुनिया के सभी करते हुए मैं,
इश से भी लौ लगाना चाहता हूं ।
पेट में रोटी नहीं, तन अर्ध नंगा,
मस्तियाँ फिर भी लुटाना चाहता हूं।
भ्रष्ट नेता, भ्रष्ट अफ़सर, भ्रष्ट जनता,
रास्ता सबको दिखाना चाहता हूं ।
कान से बहरे हुए कानून को मैं,
दास्तां अपनी सुनाना चाहता हूं।
आज पंडित, मौलवी, नेता सभी के,
राज़ से पर्दा उठाना चाहता हूं ।
है भले मुझको रुलाया इस जहां ने,
मैं ज़माने को हंँसाना चाहता हूं ।
तुम पकड़ना चाहते हो मछलियांँ पर,
मैं तुम्हें मोती दिलाना चाहता हूं।
