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Dr.Purnima Rai

Abstract Tragedy Inspirational

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Dr.Purnima Rai

Abstract Tragedy Inspirational

मैं-मेरी (कविता)

मैं-मेरी (कविता)

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मैं-मेरी में जीवन बीता।

अहंकार में मानव जीता।।

कैसी विकट घड़ी है स्वामी,

हर क्षण मेरा कष्ट में रीता।।

कभी न चाहा बुरा किसी का।

सुख में बीते जीवन सब का।।

पर पीड़ा को गले लगाकर,

भला करें हम सारे जग का।।

जगत अंधेरा पंख फैलाता।

स्व विवेक तब राह दिखलाता।।

मृदुल मुस्कान बिखेर लबों पर,

भारत का वह वीर कहलाता।।

एक खुशी का त्याग करोगे।

दूनी खुशियाँ ही पाओगे।।

बात समझ में आये "पूर्णिमा ",

जन-मन को फिर समझाओगे।।



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