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Jignesh Kotadiya

Tragedy

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Jignesh Kotadiya

Tragedy

मैं जी जाता - The End Moments Of Devdas

मैं जी जाता - The End Moments Of Devdas

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यक्रित के विक्षत कोष हुए

अवशीत हुआ जठरानल भी

प्रिय आकर मेरे मुख में मधुरस

टपकाता...मैं जी जाता

जो इस व्याबाध का कारक है

सो ही के कर उपचारक है

करदक्ष वो छूकर प्राण अंगों में

भर जाता...मैं जी जाता

नभ निष्ठुर ने आह्लाद किया

मूक दर्शक बन अभिताप दिया

परितप्त मेरे तन पर थोड़ा जल

बरसाता...मैं जी जाता

करने तुमको विस्मृत प्रिये

भटका हूँ मधु से प्रीत किये

कोई बिध नयनों से तुम आनन

बिसराता...मैं जी जाता

शत मोह भरे मन मण्डल से

शत पीर भरे तन पिंजर का

अविरत अविनय उपभोग समय पर

रुक पाता...मैं जी जाता

प्रति पल है शिथिलता की ग्लानि

चुभ नित्य रही अपरिध हानि

सखी कर तेरे मुझ कर में निरंतर

रख पाता...मैं जी जाता

जैसे तटिनी सागर से मिले

कण रसपाकज के पय में घुले

मुझसे रच ऐसा स्थायी समन्वय

प्रिय आता...मैं जी जाता

प्रिय आता...मैं जी जाता

शैशव घट से मन को भाता, प्रिय आता

सुख की मंजूषा छलकाता , प्रिय आता

शशि किरनों सी देने शाता, प्रिय आता

निस्सौरभ वन को महेकाता, प्रिय आता

प्रिय आता...मैं जी जाता


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