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Alok Singh

Abstract

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Alok Singh

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मैं देर रात तलक जगता हूँ

मैं देर रात तलक जगता हूँ

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हाँ मै देर रात तलक जगता हूँ 

क्योंकि मुझे समय को 

चलते देखना 

अच्छा लगता है...


जब रात में तारीख...

खुद को बदलती है...

तो एक पल में...

एक दिन की तबदीली को 

महसूस करना 

अच्छा लगता है...


सिर्फ इंसान ही तो नहीं

बदलता...

ज़र्रा ज़र्रा...

सब कुछ तो बदलता है...


रात के अंधेरे में

जब चुप्पियां 

बाते कर रही होती हैं...

दुनिया सो रही होती है...


तब... दबे पैर...

समय करवट लेता है

खुद की थकावाट उतार कर 

अगले दिन के लिये तैयार 

खुद को करता है...


अनगिनत ज़ख्मो को भूल 

उम्मिदों की बगियाँ से तोड़ कुछ फूल 

चल पड़ता है फिर से...

कन्धे से कन्धा मिला...

कभी खुद के लिये...

तो कभी अपनो के लिये...


जब 24 बजे से खुद को 

नीचे गिरा... शून्य से 

फिर से शुरू करता है 

तो... उसकी इस कोशिश 

को देखना अच्छा लगता है 


हाँ मैं देर रात तलक जगता हूँ 

क्योंकि मुझे समय को 

चलते देखना 

अच्छा लगता है ...


कोई शिखर पर पहुँच कर 

गिरे...

और इक पल में ही संभल कर 

फिर से शिखर की तलाश में चले 

वो हिम्मत... वो ज़जबा...

देखने में अच्छा लगता है 


हाँ मैं देर रात तलक जगता हूँ 

क्योंकि मुझे समय को 

चलते देखना 

अच्छा लगता है...


दिन के शोरगुल में

घडी की टिक टिक 

करती धडकने कहाँ सुन पाता हूँ 

क्या बोल रही...


क्या राज अपने खोल रही 

कहाँ जान पाता हूँ 

इसलिये रात में...

मुलाकात करता हूँ 

उसकी धड़कनों से 


अपनी धड़कनों को ज़िन्दा रखने 

का हुनर सीखता हूँ 

हाँ मैं देर रात तलक जगता हूँ 

क्योंकि मुझे समय को 

चलते देखना 

अच्छा लगता है...


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