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Amit Kori

Abstract


5.0  

Amit Kori

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मैं डरता हूँ

मैं डरता हूँ

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अपनी परेशानी किसी से नहीं कहता हूँ 

बात छोटी हो या बड़ी दिल में दबाये रखता हूँ 

शब्दों का ज्वालामुखी मन में लिए फिरता हूँ 

इसका मतलब यह नहीं कि मैं डरता हूँ। 


हर सुबह एक साफ़ मन लेकर घर से निकलता हूँ 

बुराई की मैल रस्ते में ही मिल जाती है 

मुझे साफ़ दिखती है दोस्तों में, दुश्मनो में और खुद में 

लिपट जाती है मुझसे, फिर भी झूट की मुस्कान मुस्काता हूँ 

इसका मतलब यह नहीं कि मैं डरता हूँ। 


लोग जलते हैं, मुस्काते हैं, झूठी शान दिखाते हैं 

मैं सुनता हूँ, रह जाता हूँ, कुछ उनको न कह पाता हूँ 

मैं उनसा नहीं यह भी नहीं कहता,

उनमें शामिल हूँ यह भी बतलाता हूँ 

इसका मतलब यह नहीं की मैं डरता हूँ। 


मलाल है हर उस बात का जिसे मैंने बीच में छोड़ी थी 

बात थोड़ी अधूरी थी बाकी मेरी मजबूरी थी 

यादों को लिए तकिये तले हर शाम सपने बुनता हूँ 

इसका मतलब यह नहीं कि मैं डरता हूँ।


सच से बहुत दूर आ गया हूँ वहा तक पहुँचाना चाहता हूँ 

लेकिन सोच और समाज के बीच फँसकर रह जाता हूँ 

झूठ के पुलिंदों पर जिंदगी गुजारता हूँ 

सच के झोंके आने पर सहम सा जाता हूँ 

इसका मतलब यह नहीं कि मैं डरता हूँ।


ख़्वाबों की बैसाखी से ही यहाँ तक आ पाया हूँ 

वरना दुनिया ने तो पहले ही अपाहिज कर रखा था 

मंज़िल तक पहुँचना है मगर ख़्वाबों के

साथ-साथ दुनियादारी भी सवाँरता हूँ 

उसूलों की श्रद्धांजलि हर साल देता हूँ 

   इसका मतलब यह नहीं कि मैं डरता हूँ।


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