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Anita Sharma

Abstract

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Anita Sharma

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माटी का पुतला

माटी का पुतला

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इस तमन्नाओं के शहर में 

अपनों में भी वो बेगाना था,

उसकी खामोशी में क्यों शोर था 

वो खुद भी कभी नहीं जाना था;


उसूलों पर चलते चलते 

खुद ज़मींदोज़ होता रहा

उनसे भी मिला गर्मजोशी से 

जिनसे वो अन-जाना था


वो कभी संभलता भी तो कैसे 

उसके पीछे बैरी ज़माना था, 

वो भटका होगा इसी ख़ातिर 

उसे खुद ही संभल जाना था;


पलटकर देखा नहीं कभी वो 

जो छूटा वो सब बेगाना था, 

वो शांत मन इक देह को ढोता 

बढ़ चला जहाँ उसे जाना था;


क्यों वो राख कुरेदता रहा 

खुद के अंश की तलाश में, 

क्या निशान छोड़ता आखिर वो 

जिसे मिट्टी में ही मिल जाना था।


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