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Uma Shankar Shukla

Tragedy

4  

Uma Shankar Shukla

Tragedy

मानवता के हिंसक

मानवता के हिंसक

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बाहर  जितनी  सादगी,  भीतर  उतना   काला ।

बोल मधुर रस घोलते, किन्तु कर्म विष- प्याला ।

पशुता का  दामन  लिए, मानवता  के  हिंसक, 

प्रेम - अहिंसा  मन्त्र  की, फेर  रहे   हैं  माला ।(1)

घृणा - द्वेष की हर तरफ, भड़क रही चिनगारी ।

किंकर्तव्यविमूढ - सी,  दिखती  जनता   सारी ।

सम्बन्धों में आपसी, जंग  छिड़ी  है  जब -जब,

दुश्मन  ने   है   देश   को,  लूटा  बारी - बारी ।(2)

आज अराजकतत्व  कुछ, लेकर दहशत- दंगा ।

देशद्रोह   का   देखिए,  नाच   कर   रहे   नंगा ।

राष्ट्रप्रेम   की   भावना,   और   सभ्यता   भूले ,

मटमैली   करते   दिखे,  पावन  यमुना - गंगा ।(3)

षड्यंत्रों  के  जाल   का,  बुनकर  ताना - बाना ।

अपनों  पर   ही  साधते,  आदमखोर  निशाना ।

दुर्व्यसनों  में  लिप्त  हैं,  ये   व्यभिचारी  दानव, 

कब  जाने  ये  क्या करें, इनका नहीं  ठिकाना ।(4)

भारत  का  हर  नागरिक, यह  कर्तव्य  निभाए ।

देशभक्ति की ज्योति का, घर-घर अलख जगाए ।

राष्ट्र  विरोधी  ताकतों,  का  सर  ऐसा   कुचलो,

फिर  कोई   गद्दार   यह , चाल  नहीं   दुहराए ।(5)



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