अच्युतं केशवं
Abstract
पिघले नहीं स्वयं निज जल में,
एसी कोई बर्फ़ नहीं है।
भले विषैला होले जितना,
मनुज मनुज है सर्प नहीं है।
तेरी गोदी एक चरण धर,
मैं वामन से विष्णु हो गया,
तेरे सन्मुख झुक न सकूँ मैं,
इतना मुझमें दर्प नहीं है।
मन आस तारा
सहज तुमने अपन...
कल लुटेरे थे ...
धूम्रपान कर ब...
छिपा हृदय निज...
उर सहयोगी भाव
भट्टी सी धरती...
अलग हो रूप रं...
आला वाले डॉक्...
भारोत्तोलन खे...
लानत है मेरे पुरुष होंने पर और उसके स्त्री होने पर ..! लानत है मेरे पुरुष होंने पर और उसके स्त्री होने पर ..!
थी जो फरमाइशें तेरी, पूरी करता गया तुझको पल पल, मैं अपना बनाता गया थी जो फरमाइशें तेरी, पूरी करता गया तुझको पल पल, मैं अपना बनाता गया
अगर मिल जाए नैना और हो जाए प्यार : तो इश्क और रिस्क का बड़ा मेल अनोखा! अगर मिल जाए नैना और हो जाए प्यार : तो इश्क और रिस्क का बड़ा मेल अनोखा!
सुनो खामोश रहकर क्या दिवारें बात करतीं हैं। सुनो खामोश रहकर क्या दिवारें बात करतीं हैं।
मैंने मन ही मन कभी ईश्वर को इतना नही पुकारा जितना उसे पुकारा। मैंने मन ही मन कभी ईश्वर को इतना नही पुकारा जितना उसे पुकारा।
बिरज वे जब गुंथ गए तो फिर अलग ही माजरा है ! बिरज वे जब गुंथ गए तो फिर अलग ही माजरा है !
जलाकर उसके अस्तित्व को भी मिटा आयेंगे पर अंतिम सांस का अनुभव कभी नहीं जान पायेंगे। जलाकर उसके अस्तित्व को भी मिटा आयेंगे पर अंतिम सांस का अनुभव कभी नहीं जान...
विश्वास और अंधविश्वास के बीच की लकीर क्यों पार करते हो विश्वास और अंधविश्वास के बीच की लकीर क्यों पार करते हो
चौखट के अंदर हो या बाहर, खुशियों को सजाती नारी। चौखट के अंदर हो या बाहर, खुशियों को सजाती नारी।
लौटा कर अपनी नादाँ नाराज़गियों को आख़री दस्तक़ के साथ लौट आया हूँ मैं।। लौटा कर अपनी नादाँ नाराज़गियों को आख़री दस्तक़ के साथ लौट आया हूँ मैं।।
निरन्तर गहरे एक अन्धक सफर में मैने एक रौशनी को पहचाना है। निरन्तर गहरे एक अन्धक सफर में मैने एक रौशनी को पहचाना है।
तेरे बिन सूना लगे ये जहाँ मधुमास में मीत तू आ जा।। तेरे बिन सूना लगे ये जहाँ मधुमास में मीत तू आ जा।।
तुम्हारे लिए मैंने एक गीत लिखा है, गीत में मैंने तुम्हें बेहद खूब लिखा है। तुम्हारे लिए मैंने एक गीत लिखा है, गीत में मैंने तुम्हें बेहद खूब लिखा है।
शायद मौसम का मिजाज बदल रहा है शायद मौसम का मिजाज बदल रहा है
शिव प्रकट उत्सव सहज भाव से प्रकृति में पूजा जाता है शिव प्रकट उत्सव सहज भाव से प्रकृति में पूजा जाता है
लौट चलें शहर से गांव की ओर, शहरों में सिर्फ दिखावे का है ठौर। लौट चलें शहर से गांव की ओर, शहरों में सिर्फ दिखावे का है ठौर।
बसंत प्रकृति से आतिथ्य स्वीकारे, प्रकृति का आंचल लगे लहराने। बसंत प्रकृति से आतिथ्य स्वीकारे, प्रकृति का आंचल लगे लहराने।
देखा लाश से लिपटे किसी को कहीं कफन बिना लाश देखी। देखा लाश से लिपटे किसी को कहीं कफन बिना लाश देखी।
आज क्या लिखूंँ? प्यार, संगीत, क़िताब, खुशी दुख या निराशा.. आज क्या लिखूंँ? प्यार, संगीत, क़िताब, खुशी दुख या निराशा..
पड़ोसी खुश हैं हमें भनक लग गई। सोच रहा हूं.......... पड़ोसी खुश हैं हमें भनक लग गई। सोच रहा हूं..........