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Shailaja Bhattad

Abstract

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Shailaja Bhattad

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अमीरी

अमीरी

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दान के नाम पर फेंके जा रहे।

 माना लोगों पर तरस खा रहे।


 दिखावे की चादर ओढ़े।

 लोगों को छले जा रहे।

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 गम विषाद सब अमीरों के चोंचले।

 महलों के इरादे कितने खोखले।

 चंद रुपयों में खरीदकर।


 हस्ती जता रहे।

बाकी कितने अभी और ढकोसले।


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