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VEENU AHUJA

Tragedy


4.3  

VEENU AHUJA

Tragedy


मान

मान

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कूड़े के ढेर में रही चित्कार

आधी खायी हुयी नन्ही जान

आज मांग रही इन्साफ है।


फ़फ़क फ़फ़क कर मुँह छिपाए '

ये लक्ष्मी ' सरस्वती की संतान है

कैसा ये समाज है

तराजू पर ममता हल्की भारी ये संसार है।


लोक लाज के भय से 'कुंती ने त्यागा कर्ण को था।

आज ' क्यों केवल कन्या के लिए हर माँ लाचार है ।

जहाँ होती दुर्गा की पूजा '

कन्या भ्रूण की दुर्गति क्यो सड़क पर वही होती आज है ।


रण चण्डी का रुप धर

है माँ आज की नारी का आह्वाहन है '

पुरुष के दम्भी समाज में

काली का ही मान है ।


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