माँ ,जननी और धरती माँ
माँ ,जननी और धरती माँ
हाँ हुई थी ग़लतियाँ
कुछ जाने -अनजाने में।
पर कब कौन चाहता है
गलत करना, गलत ठहराया जाना।
पर उतने पर ही रुकना नहीं कभी
क्योंकि चलते रहना ही ज़िन्दगी है।
सफलता की निशानी है संघर्ष
और प्रयास से ही मिलेगी मंज़िल।
न भी मिले मंज़िल तो स्वीकारेगी
तुम को बाँहे पसारे
माँ, जननी और धरती माँ।
उनके तो कोख जाये हो तुम
सुबह के भूले को कब माँ ने भुलाया है?
उसने अपने हर बच्चे को
आगे बढ़ गले लगाया है।
