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Harshita Dawar

Drama

3  

Harshita Dawar

Drama

मां बेटी की अधुरी कहानी

मां बेटी की अधुरी कहानी

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आज दीवाली है, पिछली बार नवंबर में थी

पर आह दिल आह भरने लगता,

जब भी वो बात याद है

मेरी ज़िन्दगी के कड़वे घूट।


आज भी गाले में नासूर बन कर गटकते हैं

आज कुछ दिल भरा भरा सा है।

जाने क्यूं जाने क्यूं

पुराने ज़ख़्म अभी भी जी रहे है कहीं।


यूं ज़ख्मों से खून बह रहा है कहीं

पिछली दीवाली से आज फिर

वही दीवाली आ गई

मेरे पलकों पे सजे सपनों को

फिर कही से चिंगारी दे गई।


आज बेटी की बात सुनकर

दिल फिर उमंगे भरने लगा।

मां में बहुत खुश हूं

देखो दरवाज़े से खुशियां दस्तक दे रही है।


मां में आपके साथ खुश हूं

पिछली दीवाली पर में खुश नहीं थी।

मैने मेहसूस किया

कुछ हिचकिचाहट घुटन सी थी ज़िन्दगी में।


कुछ नहीं बहुत बंदिशे में जकड़े

हम दोनों के ख़्वाब को

किसी पिंजरे में जकड़ा हुआ महसूस होता

जैसे किसी पंछी के पंख काट कर।


उन्हीं पंखों से हमारे सामने को रोज़ कर

अपनी ख्वाहिशों को हवा देता रहा वो।

कभी सोचा ही नहीं उसने अपनी

आंखें में की कुछ हम दोनों के भी

सपनों हो सकते हैं।


हम भी कुछ दूरदर्शी होगों हो सकते हैं

मेरी बेटी और मेरी उड़ान को

उफ़ान में छोड़ कर चला गया।

किसी और रास्तों पर चलने का

संकल्प केसे लिया उसने।


ज़िन्दगी के फैसलों में हम भी तो हकदार दे

पर आज दिल सवालों के पर्वत के नीचे फिर दबा है।

कितना सोचा ना सोचूँ

फिर आज वही दीवाली आ गई।


पुराने ज़ख्मों को हवा दे गई

दिल आज फिर बेकरार हो रहा था।

पर बेटी और मां के अरमानों को

उफ़ान में लपेट कर बीच मझधार में छोड़ गया वो।


बस अब दुनिया सिमटी सी लगी मैं

मेरी बेटी की आंखो में खुशियां दिखने लगी मैं।

वो खुश है मेरे साथ

बस मां बस मां चाहिए कहने लगी।


बस ये सुन कर दिल भर गया

उसको सीनें। से लगा कर माथा चूम लिया।

जीने का मकसद पूरा हो गया

मां मैं खुश हूं

मुझे बस मां चाहिए।


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