STORYMIRROR

Sandeep Panwar

Abstract

4  

Sandeep Panwar

Abstract

मालूम नहीं

मालूम नहीं

1 min
258

ये कैसी दुविधा है 

तुझे देख कर कुछ अपना 

सा लगता है ऐसा लगता है 

हम साथ है कई जन्मों से,


मेरे सामने होते हुए भी

तू बहुत दूर है मुझसे

ऐसा महसूस हो रहा है

कि तू धरती है और


मैं आसमान जो

आमने सामने

होते हुए भी 

कभी मिल नहीं सकते

ये कैसी कशमाकश है

 

तेरे मेरे बीच तू उस बेगानी 

बरसात की तरह है जिसमे 

पूरा जहा तो भीगता है पर मैं नहीं,

तू उस बेगाने आईने की तरह है


क्योंकि मैं जब भी तुझे 

देखता हूँ मुझे बस अपने ही 

जज्बात दिखाई देते हैं,

ये कैसी कशमाकश है 


तेरे मेरे बीच मालूम नहीं

कुछ कहानियाँ बयान

करने के लिए नहीं होती

उन्हें अनकही ही रखा 

जाए तो अच्छा होता है।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract