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V. Aaradhyaa

Romance Fantasy

4  

V. Aaradhyaa

Romance Fantasy

मादक बसंत

मादक बसंत

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 खिले हुए सरसों के पीत ओढ़नी से फूल

 अपनी सुरभि से चमन महका रहा।


 चंचल पवन मंद-मंद बह चली है।

 अंग-अंग में अनंग सी जग रही है।।


मादक बसंत की देखो अठखेलियां।

बागों में कुक रही बैरन कोयलिया।।


 मंजरी रसाल से चुये जो मकरंद रसरंग ।

 मन के साथ तन को भी बना रहा मतंग।।


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