मादक बसंत
मादक बसंत
खिले हुए सरसों के पीत ओढ़नी से फूल
अपनी सुरभि से चमन महका रहा।
चंचल पवन मंद-मंद बह चली है।
अंग-अंग में अनंग सी जग रही है।।
मादक बसंत की देखो अठखेलियां।
बागों में कुक रही बैरन कोयलिया।।
मंजरी रसाल से चुये जो मकरंद रसरंग ।
मन के साथ तन को भी बना रहा मतंग।।

