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निशा शर्मा

Abstract

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निशा शर्मा

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लुकाछिपी...

लुकाछिपी...

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लुकाछिपी खेलती है हर बार मेरी किस्मत भी

जब वो बार बार मुझसे मिलता है बिछड़ जाता भी

लुकाछिपी खेलती है मेरे दिल की हर धड़कन भी

जब वो इश्क मुझसे कबूलता है मुकर जाता भी

लुकाछिपी खेलती है मेरे घर की अब चौखट भी

जब वो आहट मुझे सुनाता है गुम हो जाता भी


लुकाछिपी खेलती है मेरे अरमानों की सौतन भी

जब वो मेरा है ये मुझको बताता है भूल जाता भी

लुकाछिपी खेलती है मुझसे उफ्फ़ मेरी ज़िंदगी भी

जब वो मुझमें जज़्बात जगाता है रौंद जाता भी


लुकाछिपी खेलती है मेरी बोझिल आंखें भी

जब वो सुकून इनमें है भरता छीन ले जाता भी

लुकाछिपी खेलती है मेरे ख्वाबों की कलियां भी

जब वो ख्वाबों के महल है बनाता तोड़ जाता भी

लुकाछिपी खेलती है मुझसे अब मेरी आत्मा भी

जब वो मुझमें है समाता फ़िर अधूरा कर जाता भी



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