लौट आना व्यर्थ है
लौट आना व्यर्थ है
सावन बीत जाये
रीत जाये आस का घट
खेती सूख जाये
पपीहा सो चुका हो चिर नींद में
तब
वर्षा लौट आये
व्यर्थ है।
चकोरी हार थककर त्याग दे क्रंदन
विरह स्वीकार कर मन
स्वयं ही स्वयं को
दिलासा दे चुकी हो
ढल गयी हो जब कुमुदिनी
तब चांद फिर आकाश में
सज जाये
व्यर्थ है।
सूख जायें बिना खिले
कलियाँ
भ्रमर गुंजन तज चुके हों
बुलबुल खो चुकी हो तान
हो गये हों सब तराने शांत उसके
जा चुके हो
निराश प्रेमी भी बाग से
तब
बहारें लौट आयें
व्यर्थ है।
सुबह के भूले
जब घर शाम को लौटे
जरूरी नहीं
घर वहीं हो
जहाँ सुबह छोड़ा था
जरूरी नहीं
घर को याद हो
उसकी शाम तक
इसलिए
न सुबह भूलो घर को
न जरूरत हो शाम को
वापस आने की
क्योंकि
शाम कितनी भी
अलबेली हो
मधुर हो
वह सुबह नहीं होती।
