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AVINASH KUMAR

Tragedy

4  

AVINASH KUMAR

Tragedy

क्योंकि वो पागल थी ना

क्योंकि वो पागल थी ना

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आम औरतों की तरह, 

खुद को संवारना नहीं जानती थी

रूप रंग की परत चढ़ाकर, 

खुद को निखारना नहीं जानती थी


क्योंकि वो पागल थी न........


उसके जगह-जगह से फटे हुये कपड़ों में-

धंसी हुई कई आंखें झांका करती थीं

बाल उसके और औरतों की तरह न थे -

लम्बे, घने, काले या कुछ और........


क्योंकि वो पागल थी न......... 

शैंपू - तेल, कंघी की गुत्थी -

सुलझाना नहीं जानती थी  


क्योंकि वो पागल थी न..........


बैठ जाती किसी भी द्वार, 

जब उसे पेट की भूख सताती 

न बोलती थी कुछ , 

न पत्थर मारती , 

बस ....चुप रहकर अपना दर्द बताती


क्योंकि वो पागल थी न........ 

शब्दों को पानी की तरह

बहाना नहीं जानती थी


क्योंकि वो पागल थी न..........


मैं अक्सर सोचा करती - कौन इसे

इस मोड़ पर लाया होगा

किसने इतना गहरा आघात

इसे पहुंचाया होगा

किया होगा किसने इस का भरोसा तार- तार


क्योंकि वो पागल थी न........... 

आम लोगों के पैंतरे अपना कर

खुद को बचाना नहीं जानती थी


क्योंकि वो पागल थी न.........


इधर कुछ दिनों से उसका पेट ,  

उभरा सा दिखने लगा था

उसके अंदर भी कोई जीव, 

सांसें लेने लगा था

शायद पेट से थी वो...  


क्योंकि वो पागल थी न.........  

हमदर्दी और वहशीपन का फर्क

पहचानना नहीं जानती थी


क्योंकि वो पागल थी न...........


पहले तो पागल ही लोग कहते थे, 

फिर कुल्टा कहलाई जाने लगी थी

लोगों की दुत्कार और मार पीट का, 

निशाना बनाये जाने लगी थी 


क्योंकि वो पागल थी न.... 

उसके साथ हुये हादसे को 

बताना नहीं जानती थी


क्योंकि वो पागल थी न........


न जाने क्या हुआ होगा उसका 

और उसके अंदर पलने वाले जीव का

अब वो आस पास कहीं नज़र न आती थी

बस, छोड़ गयी थी एक कटोरा

जिसमें लोगों का बासी खाना खाती थी


क्योंकि वो पागल थी न....... 

लोगों का जानवर पन

उन्हें दिखाना नहीं जानती थी


क्योंकि वो पागल थी न...।



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