क्यों
क्यों
क्यों......
क्यों आए इस दुनिया में - क्या था ध्येय
प्रकृति ने क्या सोचा,क्या क्या खेल रचे
यह तो जाने वही - सृष्टि सदा है श्रद्धेय
मगर है छोटी सी शिकायत मेरी उस से
क्यों रखा अनजान हमें अपनी दशा से
अपनी असलियत से , वास्तविकता से
विशाल , अद्भुत ,प्रचंड अपनी मंशा से
आदि ज्ञात न अंत-छुपाया सभी हमसे
छोड़ दिया सब हम पर -ढूंढो अपनी राह
ढूंढो अपनी मंज़िल ,समझो अपने दायरे
रुकना-थमना,गिरना-संभलना-पाना थाह
जीवन के गहरे समंदर की खुद ही ,प्यारे
हम ठहरे नादान ,अपरिपक्व ,भूले भटके इन्सान
गहरे समंदर में गोता लगाने छोड़ दिया तकदीर ने
कैसे लगेंगे पार,कैसे होगा उद्धार,क्या करे इन्सान
जान पाएंगे क्या है अपनी दशा, दिशा तकदीर में?
उलझ कर रह गए सवालों में -सात दशक कम पड़े
सवाल वही- जवाब नहीं - हम सभी भटक रहे
तब भी , अब भी- जिज्ञासा शांत न होगी
क्षितिज नज़र आता रहेगा- हम वहीं के वहीं रहे
पहुंच न पाएंगे उस तक-जितने भी हों दशक,कम पड़े।
