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Balaram Barik

Abstract Tragedy Action Classics

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Balaram Barik

Abstract Tragedy Action Classics

क्या फर्क पड़ता है

क्या फर्क पड़ता है

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क्या फर्क पड़ता है
 क्या फर्क पड़ता है कौन जीतता है,
कौन हारता है—
इज़राइल, ईरान, अमेरिका, फिलिस्तीन, यूक्रेन या रूस, जब हर जीत की कीमत किसी माँ की कोख चुकाती है। लाशों पर खड़ी होती हैं जीतें,
और नारों के बीच दब जाती है एक घर की चीख—
जहाँ एक औरत आज भी दरवाज़े पर आखिरी बार लौटने की उम्मीद टाँगे बैठी है।
 बच्चे अब भी पूछते हैं— “पापा कब आएंगे?”
और जवाब में सिर्फ़ एक फोटो रह जाती है,
 जिस पर माला चढ़ी होती है।
 कुछ लोग, जिनके हाथों में सत्ता है,
 वो युद्ध को रणनीति कहते हैं,
और मौत को “आवश्यक बलिदान” लिख देते हैं। क्या फर्क पड़ता है कि बंगाल, असम, केरल या कर्नाटक में कौन कुर्सी पर बैठा है—
 कुर्सियाँ बदलती हैं,
 पर खेल वही रहता है।
 भीड़ को भड़काना आसान है,
 भाई को भाई के खिलाफ खड़ा करना आसान है,
धर्म के नाम पर आग लगाना आसान है—
क्योंकि जलता हमेशा कोई और है।
 सड़क पर बहता खून कभी हिंदू नहीं होता,
कभी मुसलमान नहीं होता—
 वो सिर्फ़ इंसान होता है,
 जिसे हमने नामों में बाँट दिया।
 चुनाव आता है—
पैसा बोलता है,
 झूठ बिकता है,
और सच किसी कोने में दम तोड़ देता है।
 जो दांव लगाते हैं,
वो जीतते हैं, जो खेलते हैं,
 वो सत्ता में आते हैं—
 और जो जीते हैं असल में…
वो कभी गिने ही नहीं जाते।
 उद्योगपति मुस्कुराते हैं,
ठेकेदार हिसाब लगाते हैं,
और आम आदमी—
बस अपने ही जख्म गिनता रह जाता है।
 सीमाएँ खींच दी गई हैं,
नक्शों पर, दिमागों में, दिलों में—
 पर दर्द… दर्द कभी बँटता नहीं।
 क्या फर्क पड़ता है अगर जीत का मतलब और ज्यादा कब्रें हों,
और हार का मतलब बस कुछ कम आँसू—
 सच तो ये है…
इस खेल में कोई जीतता ही नहीं।
 बलराम बारिक


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