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Pallav Sanyal

Classics

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Pallav Sanyal

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कविता

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कविता प्रस्तुत है: चांदनी का श्वेत श्रृंगार रात की चादर, गहरा नीला सा है , आसमां में खिला नन्हा चांद सा है । उसकी दुधिया रोशनी जब ज़मीं पर उतरती है, उस सफेद गुलाब की पंखुड़ियों को निहारती है। अंधेरे के सीने पर जैसे कोई नूर बिखरा हो, ओस की बूंदों में सिमटा हुआ एक सवेरा हो। मनमोहक यह दृश्य, शांति का पैगाम, सफेद गुलाब के नाम लिखी है यह मखमली शाम। कांटों की बाहों में भी वह मुस्कुराता रहता है, बिना कहे ही प्रेम की कितनी बातें कहता है। चांदनी की शीतलता ने उसे संवारा है, जैसे किसी कवि का सबसे प्यारा है। पंखुड़ियों पर ठहरी ओस, मोती सी चमकती है, गुलाब की खुशबू धड़कनों में धीरे से महकती है। रात का सन्नाटा भी उसे निहारता है, चांद किरणों से उसका रूप संवारता है। पवित्रता का प्रतीक यह फूल, कितना पावन है, इसे देखकर महक उठता सबका ही मनभावन है। श्वेत रंग में घुली है एक अनोखी सी सादगी, चांदनी और गुलाब की यह अद्भुत है बंदगी। पल्लव सान्याल


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