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Pallav Sanyal

Children Stories Classics Others

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Pallav Sanyal

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मेरा बचपन

मेरा बचपन

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कविता : मेरा बचपन  

मेरा बचपन—  
जिसमें प्यार था,  
और रूठने-मनाने की  
नर्म-सी गिला भी था। 
 
हर दिन   
कोई न कोई मुस्कान खिलती थी,  
मानो मन कच्ची धूप में  
धीरे-धीरे  
और मीठा हो जाता था।  

उस समय  
खुशियाँ वजह नहीं पूछती थीं,  
एक कंचा, एक पतंग,  
और माँ की आवाज़  
पूरा दिन खुशनुमा बना देती थी।  

मन खिलखिलाता था,  
बिना डर, बिना बोझ,  
आँखों में सपनों की नदियाँ थीं  
और दिल में  
असीम विश्वास था।  

उन्मुक्त आकाश को देखकर  
सोचता था—   
मैं भी उड़ूँगा,   
पंख नहीं थे फिर भी   
हौसला आसमान जितना था। 
  
न हार का डर था,   
न जीत की जल्दबाज़ी,   
बस चलना था,   
हंसते हुए,   
खुद के साथ।  
 
आज भी   
जब मैं थक जाता हूँ,   
तो वही बचपन   
चुपचाप मेरे भीतर आकर कहता है—   
“थोड़ा मुस्कुराओ,   
सब कुछ फिर आसान हो जाएगा।” 

पल्लव सान्याल


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