कविता
कविता
:रिश्तों की यह कैसी रीत
सबका भला चाहा मैंने, सबकी खुशी मांगी,
पर मेरे हिस्से आई बस, तन्हाई और जिंदगी बेमानी।
जहाँ-जहाँ मैंने दिया प्यार, वहाँ-वहाँ मिली लानत,
अपनों ने ही दागा मुझे, यही है इस जग की इबादत।
परिवार के आँगन में भी, मिला न कोई साया,
जिसने चाहा सबको दिल से, उसे ही ठुकराया।
मेरी मुस्कान के लिए कोई, एक पल न रुका,
पर मेरी आँखों का दर्द देख, सब चुपके से भागा।
सब स्वार्थ की डोर से बंधे, यही दुनिया की चाल,
खुद जीने की होड़ में, किसे फ़िक्र मेरे हाल।
मैंने खुद को मिटा-मिटाकर, औरों को संवारा,
और बदले में मुझे मिला, सिर्फ धोखे का नज़ारा।
जब मांगी अपनी खुशी थोड़ी, नालायक कहलाया,
छल और फरेब की इस दुनिया में, खुद को ही खो पाया।
जो कलंक के शब्द मिले, वो घाव गहरे हैं,
अपनों के दिए ज़ख्म ही, सबसे तीखे और गहरे हैं।
खुद को खोकर भी मैं यहाँ, बुरा ही कहलाता हूँ ,
रिश्तों की इस भीड़ में भी, अकेला रह जाता हूँ ।
पर एक बात याद रखो, जो टूटा है वो सोना है,
सच्चा दिल कभी गलत नहीं, चाहे जग को खोना है।
पल्लव सान्याल
