कविता को ना जान सका
कविता को ना जान सका
नहीं जानते कविता रचना ,बोलों का है ना ज्ञान मुझे !
शब्दों को कैसे मैं पिरोऊँ ,इतना सब ना ध्यान मुझे !!
रस की पगडंडियों में मैं फिसल जाता हूँ !
अलंकारों के जालों में मैं तो फंस जाता हूँ !!
कुछ इसके उलझन में ही उलझकर सारा !
लय , ताल और छंदों को मैं भूल जाता हूँ !!
नहीं जानते सुंदर लिखना ,संगीतों का है ना ज्ञान मुझे !
शब्दों को कैसे मैं पिरोऊँ ,इतना सब ना ध्यान मुझे !!
प्रेम प्रणय प्रियतम की बातें सब सुन लेते हैं !
अभिसार शृंगारिक कविता सब पढ़ लेते हैं !!
मुझको भी ये कविता सबसे सुंदर लगती हैं !
पर हम व्यंगों की दुनियाँ में खोये रहते हैं !!
नहीं जानते अपना कहना ,पाठक की ना पहचान मुझे !
शब्दों को कैसे मैं पिरोऊँ ,इतना सब ना ध्यान मुझे !!
कविता से बस बात किसी को कह सकते हैं !
शालीनता के मंत्रों को सब दिन जप सकते हैं !!
सत्यम ,शिवम और सुंदरम के धुन पर हरदम !
बातें सबके सामने निर्भयता से रख सकते हैं !!
नहीं जानते अशिष्ट बनना ,भद्रता की है पहचान मुझे !
शब्दों को कैसे मैं पिरोऊँ ,इतना सब ना ध्यान मुझे !!
