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Kunda Shamkuwar

Abstract Others Fantasy

4.7  

Kunda Shamkuwar

Abstract Others Fantasy

कवि कागज़ और कलम

कवि कागज़ और कलम

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164


चलो कुछ लिखा जाए

कहते हुए कवि ने कलम उठायी

सोचते हुए कागज़ पर लिखना चाहा

लेकिन कलम जैसी अटक गयी


कलम के रुकने से

कविता भी ठहर गयी

कविता के विषय और अहसास

सब जैसे अचानक ठहर गए


रुकती कलम को छोड़कर

सृजन के पलों में मशगूल होकर

कवि कम्प्यूटर के कीबोर्ड पर

ताबड़तोड़ उंगलियाँ चलाने लगा


कुछ लफ़्ज़ स्क्रीन पर दिखने लगे

लेकिन कवि सन्तुष्ट नही हो रहा था

कंट्रोल जेड और कंट्रोल वाय में

बस उलझता ही जा रहा था


आज कवि उदास हो रहा था

उसकी कविता बन नही पा रही थी

कभी लफ़्ज़ साथ छोड़ दे रहे थे

तो कभी उन लफ़्ज़ों के अहसास


बिना किसी अहसासों के लफ़्ज़

बेहद कड़वे और कठोर लग रहे थे

आज के हालातों पर लिखना छोड़

कवि फैंटेसी पर कविता लिखने लगा


आये दिन अखबारों की खबरों से

कवि को अब अंदाज़ा हो गया है

सदियों बाद उसके रचे नायकों की

मूर्ति बनाके लोग उन्हें पूजने लगेंगे


बस फिर एक चमत्कार हुआ

कीबोर्ड पर कवि की उँगलियाँ

ताबड़तोड़ चलकर महाकाव्य 

और उस नायक को रचने लगी  ....



 









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