कस्तूरी नाभि में बसे
कस्तूरी नाभि में बसे
ज़िन्दगी बेहद खूबसूरत है ,
पर सबको समझ नहीं आता है।
लोग इश्क तो कर लेते हैं ,
पर उन्हें निभाना नहीं आता है ।।
कस्तूरी जैसी जो गंध है ,
यह मन के अंदर की सोच है ।
इधर उधर क्या भागना ,
साधक और साधन की लोच है ।।
खुद मन को जब ढूंढता है कोई ,
खुशबू सारी फैलाती गंध है ।
कस्तूरी मन में बसा हुआ है ,
लोग कहीं और किसी पर मुग्ध है ।।
साधक साधन साधना करते हैं ,
चंदन बंधन मिलकर साध्य हैं ।
हृदय में बसाकर अपने प्रेम को ,
ये मन मज़बूती से बांधें बाध्य हैं ।।
