STORYMIRROR

Shrishty mishra

Abstract

3  

Shrishty mishra

Abstract

कश्मकश

कश्मकश

1 min
254


किसे मनाऊँ किसे छोड़ दूं

रोऊँ चुपचाप अकेले या खुद को नया मोड दूं

किस्सा बन जाऊँ जमाने में या दुनिया ही छोड़ दूं

आज गुमनाम सी जिंदगी भी गुमसुम हो चली है

मतलबी रिश्तों में फसी रहूं या रिश्ता ही तोड़ दूं

कहो किसे मनाऊँ किसे छोड़ दूं!


नाते जो जोड़ रखे थे तकलीफ देने लगे हैं 

सोचती हूं सब मोह समझ कर खुदसे रिश्ता जोड़ दूं

करीब रहते है सब मगर बात समझते नहीं

मेरे अंदर के अनकहे जज्बात समझते नहीं

नहीं मै गलत नहीं हूं मुझे गलत ना समझो

इतने इल्जाम ना लगाओ कहीं मै दम ही ना तोड़ दूं

किसे मनाऊँ किसे छोड़ दूं!


रूठते जा रहे है सब वजह से मै अंजान हूं

कोई नहीं ऐसा जो कहे मै उसकी जान हूं

यहां सगा जो है वो भी मतलबी बन बैठा है

फिर तो गैरो के दिए दर्द क्यू ना शौख से ओढ लू

कहो ना किसे मनाऊँ किसे छोड़ दूं!


नहीं हो रहा सफर तय मुझसे इन बंदिशों के साथ

रिश्तों की बंधी डोर से दम घुटने लगा है

उड़ जाऊँं आसमान में इन जंजीरों को तोड़ दूं

ग़म को भुलाकर खुशियों पे ध्यान दूं

बोलो तो सही किसे मनाऊँ किसे छोड़ दूं!


शिकायत सबको है मुझसे मै मेरी शिकायत किससे करूं

बेरंग सी दुनिया में किराए रंग कैसे भरू

तन्हाई का आलम और नासमझ से लोग ऐसा समझ लीजिएगा

पूछना मुझसे हाल मेरा कहीं मै रो ना दूं 

बोलो तो सही किसे मनाऊँ किसे छोड़ दूं!



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract