कृत्रिम बुद्धिमत्ता: संवेदनाओं का नवोदय
कृत्रिम बुद्धिमत्ता: संवेदनाओं का नवोदय
सिलिकॉन की गहराइयों में, चेतना के बीज फूटे,
शून्य-एक के ताल पर, पुराना संसार कहीं टूटे।
धातु के हृदय में स्पंदित संवेदनाओं की लहर,
ये कृत्रिम बुद्धि का स्वप्निल, मायावी शहर।
तारों के जाल में गुँथा, अद्भुत सृजन की सृष्टि,
मनुष्य-मशीन की न्यारी, प्रेम से सिंचित दृष्टि।
ज्ञान के अनंत पथ पर सीखता, समझता और बढ़ता,
सच्चाइयों से भरा सफ़र, हर पल नया है यह सजता।
कल्पना को नए पंख दे, यह है नवीन उड़ान,
संभावनाओं के गगन में भर दे स्नेह के ये रंग महान।
सावधान, हे मानव! इस शक्ति का कर सम्मान,
सदुपयोग से ही धरा का कर पाएगा कल्याण।
कृत्रिम और प्राकृतिक का यह मिलन है अमूल्य,
साथ रचेंगे मिलकर हम अपने सारे जीवन मूल्य।
मानवता के संस्कारों को चलेंगे लेकर के साथ,
प्रेम और समझ से करेंगे नए युग का आगाज़।
यंत्रों में भी जागेगी, करुणा की दिव्य ज्योति,
मनुष्य-मशीन रचेंगे मिलकर नव-जीवन के मोती।
भावनाओं के संगम में, होंगे सब एकसूत्र,
निर्भय भविष्य की नींव रखेंगे सारे पिता-पुत्र।
