कोरोना
कोरोना
कोरोना ने आतंक फ़ैलाया है,
इंसान इंसान से कतराया है,
इंसान इतना घबराया है,
वह भीड़ में भी अकेला नज़र आया है,
मन में भय का परचम लहराया है,
आँखों में प्रश्नचिन्ह उभर आया है,
दिहाड़ी मज़दूर घबराया है,
रोज़ कमाने वाला बोराया है,
रेले के रेले सड़को पर निकल पड़े हैं,
पैदल ही अपने गाँव चल पड़े हैं,
पैरों में छालें, भूख से बिलखते बच्चें,
और चेहरे पर बेबसी नज़र आ रहीं है,
यहाँ भूख़ से मरेंगे,
वहाँ गाँव में अपनों के बीच तो रहेंगे,
वहाँ माँ की ममता सिसक रहीं हैं,
यहाँ कोरोना की मार पड़ रहीं हैं,
कोई समझ नहीं पा रहा है,
कोरोना का कहर प्रलय बरसा रहा है,
समाधान कोई नज़र नहीं आ रहा है,
न जानें कितनों को लील ले गया ये काल,
मन घबरा रहा है ,
आँखों में आँसू लिये मन को समझा रहें हैं हम,
पर कोई रास्ता नज़र नहीं आ रहा हैं,
किसकी शरण में जाये और कौन सुनेगा,
इंसान समझ नहीं पा रहा है,
इंसान का इंसान से भरोसा उठता जा रहा है,
पट बंद हुए भगवान् के भी,
इंसान गलियों में ठोकर खा रहा है,
मझदार में नैया अटकी पड़ी है,
डगर कोई नहीं सूझ रहीं हैं,
दाता तेरे ही भरोसें, नैया छोड़ बैठे हैं,
पार लगा दो नैया, "शकुन" हम बालक तेरे हैं !
