कन्यादान
कन्यादान
रीत ये दुनिया की,
मैं भी निभाता हूँ ....
देता हूँ एक और आंगन बेटी को
पर कन्या दान की रस्म को,
नहीं निभाता हूँ .....
कैसे दे सकता हूँ,
दान के स्वरूप मैं ....
क्या आत्मा के बिना,
मैं जिंदगी गुजार सकता हूँ .....
था ये बीज मेरे आंगन का,
अपने खून से सींचा है ....
बसते है प्राण इसमें,
अपने जीवन का,
अमृत इसे कहता हूँ .....
ममतामयी माँ की,
सूरत इसमें पाता हूँ .....
देखता हूँ प्यारी सी गुड़िया इसमें,
मेरे सुंदर खिलौने से,
अपनी थकान मैं मिटाता हूँ ....
कैसे कर दूँ दान मैं,
मैं तो अपनी सांसे ....
इस पर लुटाता हूँ !
है सांसे मेरी,
जिसे देख जिंदगी गुजारता हूँ .....
नहीं करता मैं कोई दान,
मैं तो अपने ...
सींचे हुआ पौधे से
किसी और के ...
आंगन की महक बढ़ाता हूँ .....
