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Priya Gupta

Abstract

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Priya Gupta

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कलयुग

कलयुग

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कलयुग है साहब,ये कलयुग,

यहाँ जान से प्यारी आन है ,

और सच्ची मुस्कान से ज़्यादा झूठी शान है ।

कलयुग है साहब, ये कलयुग ,

यहाँ झूठ की कीमत और सच का तमाशा है;

जिसका कोई मोल नहीं,बस दिखावा है। 

कलयुग है ये कलयुग ,बड़े ही अजीब कायदे हैं,इनके ,

यहां भूख से जयेदा धर्म पर बहस होती है, 

यहां रिश्तों से जयेदा अहम् की जरूरत होती है।

कलयुग है साहब ये कलयुग।

     


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