कलम के सिपाही
कलम के सिपाही
कविता- कलम के सिपाही।
हम कलम के सिपाही बढ़ते चलेंगे,
लेखनी से सदैव लिखतें चलेंगे।
मनुजता से नही,अंध-तम से लडेंगे,
लेखनी से सदैव लिखतें रहेंगे।।
दौर हो शांति अथवा युद्ध का,
लेखनी कब सहम गयी?
रण-विजय के शोर में ,
वो सदैव चलती गयी।।
हम कलम के सिपाही बढ़ते चलेंगे,
छल- छदमो से सदैव लड़तें चलेंगे
राम जी का मान हो ,
या रावण का अभिमान हो।
लेखनी चलती रही...
वो कब थकी??
पांडव वनवास हो,
या कौरव रानीवास हो।
वो ना थमी....
चलती रही...बढ़ती रही...।।
हम कलम के सिपाही बढ़ते चलेंगे,
लेखनी से सदैव लिखतें चलेगे।
क्रांति हो या रोर हो,
जगत में चाहें शांति मग्न शोर हो
कलम लिखती रही...
प्रेमी के इश्क हो ,
नैनो में अश्क हो।
प्रकृति में बहार हो,
फूलों की बौछार हो।।
वो सब कुछ लिख रहा...
कलम का सिपाही
अब भी जग रहा?
हम कलम के सिपाही बढ़ते चलेंगे,
लेखनी से सदैव लिखतें चलेगे।
