देख मुझे माँ
देख मुझे माँ
शांतचित्त, गंभीर हूँ कितनी, न शरारत करती कभी
लड़ती-झगड़ती जो तुमसे रहती, देख माँ, आज मैं कितनी बदल गई।
सारी शिकायतें धूमिल होती, नकचढ़ी भी तो मैं न रही
जो मिल जाता खुश हो जाती, परिधान, पहनती तेरे भेजे सभी।
तरस गई माँ तेरी गोद को, भाव शून्य सी हो मैं गई
जग जाहीर न करती दु:ख-दर्द को, कर्तव्य भी करती पूर्ण सभी।
न थकती, न कभी रुकती, आराम भी न करती माँ मैं कभी
याद आते क्षण वो सारे, बिताएँ तेरे संग जो थे कभी।
ख्वाहिशें सबकी पूरी करती, दूर, न होते गीले-शिकवे कभी
स्त्री जीवन कभी अपना न होता, एहसास ये होता मुझको अभी।
