किसान
किसान
चिलचिलाती धूप हो ,या हो ठिठुरता शीतकाल!
हल चलाता है फिर भी, किसान नही होता बेहाल!!
छोटे छोटे से बीज जब वो बोता है!
फिर एक दिन बडा खेत वो होता है!!
खेतो का कण-कण है जिसकी जान!
खेती से जुटाता है वो अपना ईमान!!
ऐसे ही नही मिल जाता है,शहर मे दुकान पर आटा!
मिलता है जब, किसान ने धूप मे गेहूँ था काटा!!
बनता है ये अन्नदाता,हिन्द का रखवाला,आन का!
ये ही बनता है फिर गौरव,मेरे भारत महान का!!
बंजर और सूखी धरती से भी सोना उगाने की हिम्मत रखता है!
अपने ही हक के लिये लडाई मौसमी-आपदा और सिस्टम से लड़ता है!!
उड़ाते हैं फिर भी मखौल उनका ये सरकारी कामकाज!
बन के रह गया मेरा किसान राजनीति का मोहरा आज!!
पूरे साल मेहनत कर ये ऊगाता है एक-एक दाना!
जो बिकता है बाहर रूपया पर मिलता है इसे चार आना!!
राजनीति ने भुला दिया जिसे वो ही देश का अभिमान है!
बचा सके तो बचा ले इसे ऐ "विकास" ये मेरा किसान है!!
अन्नदाता ही देश की आन बान शान है!
ऐसा मेरा महान पुरूष वो किसान है!!
